Wednesday, December 19, 2012
Saturday, September 29, 2012
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी किसी से कुछ प्यारी सी बात होना
कभी किसी भूले बिसरे दोस्त से मुलाक़ात होना
कभी अनकही किसी की बातें समझ लेना
और कभी किसी के सब कुछ समझाने पे भी नाराज़ होना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी किसी अजनबी के सलीके से खुश होना
और कभी अपने ही सलीकों से नाखुश होना
कभी चिल्ला के कह देना सब कुछ
और कभी सब कुछ सुन के भी चुप रहना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी कुछ ना पा के भी खुश होना
और कभी सब कुछ पा के भी उदास होना
कभी यूँ बिना पंख के ही आसमान में उड़ना
और कभी पंख मिलने पे भी पेड़ की किसी डाल पे बैठना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी एक फूल की खुशबू से ही महक उठाना
और कभी पूरा गुलदस्ता ही सूना लगना
कभी बिना बात के घंटों किसी तस्वीर को देखना
और कभी उसकी एक नज़र भी गवारा न होना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी दूर हो के भी किसी के पास होना
और कभी किसी के पास होने पे भी दूर लगना
एक पल लगे सब कुछ अपना सा
और एक पल लगे सब कुछ अजनबी
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी यूँ ही अच्छा लगे राहों पे चलना
और कभी हर रास्ता अनजाना लगना
कभी थाम के किसी अजनबी के हाथ उससे रास्ता पार करा देना
और कभी अपने का ही रास्ते में हाथ छोड़ देना
कभी दिल पे ना लेना किसी की बात
और कभी किसी की अनकही बात को दिल से लगा लेना
सोचता हूँ कितना बदलता है इंसान अपने ही ख्यालों में और कहता है की
बस शायद ये ना कहा होता
और शायद ये ना सोचा होता
यूँ ही शायद समझ लिया होता
कभी किसी से कुछ प्यारी सी बात होना
कभी किसी भूले बिसरे दोस्त से मुलाक़ात होना
कभी अनकही किसी की बातें समझ लेना
और कभी किसी के सब कुछ समझाने पे भी नाराज़ होना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी किसी अजनबी के सलीके से खुश होना
और कभी अपने ही सलीकों से नाखुश होना
कभी चिल्ला के कह देना सब कुछ
और कभी सब कुछ सुन के भी चुप रहना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी कुछ ना पा के भी खुश होना
और कभी सब कुछ पा के भी उदास होना
कभी यूँ बिना पंख के ही आसमान में उड़ना
और कभी पंख मिलने पे भी पेड़ की किसी डाल पे बैठना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी एक फूल की खुशबू से ही महक उठाना
और कभी पूरा गुलदस्ता ही सूना लगना
कभी बिना बात के घंटों किसी तस्वीर को देखना
और कभी उसकी एक नज़र भी गवारा न होना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी दूर हो के भी किसी के पास होना
और कभी किसी के पास होने पे भी दूर लगना
एक पल लगे सब कुछ अपना सा
और एक पल लगे सब कुछ अजनबी
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी यूँ ही अच्छा लगे राहों पे चलना
और कभी हर रास्ता अनजाना लगना
कभी थाम के किसी अजनबी के हाथ उससे रास्ता पार करा देना
और कभी अपने का ही रास्ते में हाथ छोड़ देना
कभी दिल पे ना लेना किसी की बात
और कभी किसी की अनकही बात को दिल से लगा लेना
सोचता हूँ कितना बदलता है इंसान अपने ही ख्यालों में और कहता है की
बस शायद ये ना कहा होता
और शायद ये ना सोचा होता
यूँ ही शायद समझ लिया होता
Monday, September 10, 2012
जीवन पथ जटिल है ये , कालचक्र कठिन है ये ,
पग - पग पे भेद भाव है , रक्त - रंजित पाँव है ,
जन्म से किसी के सर वंश की छाँव है ,
झूठ के रथ पे सवार डाकुओ का गाँव है ,
किसी के पास है छल - कपट , किसी को रूप का वरदान है ,
ये सोच के मत बैठ जा की ये विधि का विधान है ,
बज रहा मृदंग है, ये कहता - अंग अंग है ,
की प्राण अभी शेष है , मान अभी शेष है ,
उठा ले ज्ञान का धनुष ,
एक कण भी और कुछ माँग मत भगवान से ,
ज्ञान की कमान पे लगा दे तू विजय तिलक ,
काल के कपाल पे लिख दे तू ये गुलाल से ,
" कि रोक सकता है कोई तो रोक के दिखा मुझे ,
हक़ छीनता आया है जो अब छीन के बता मुझे "
ज्ञान के मंच पर सब एक सामान है ,
विधि का विधान पलट दे , वो ब्रहमास्त्र ज्ञान है ,
सिर्फ ज्ञान ही आपको आपका हक़ दिलाता है।
पग - पग पे भेद भाव है , रक्त - रंजित पाँव है ,
जन्म से किसी के सर वंश की छाँव है ,
झूठ के रथ पे सवार डाकुओ का गाँव है ,
किसी के पास है छल - कपट , किसी को रूप का वरदान है ,
ये सोच के मत बैठ जा की ये विधि का विधान है ,
बज रहा मृदंग है, ये कहता - अंग अंग है ,
की प्राण अभी शेष है , मान अभी शेष है ,
उठा ले ज्ञान का धनुष ,
एक कण भी और कुछ माँग मत भगवान से ,
ज्ञान की कमान पे लगा दे तू विजय तिलक ,
काल के कपाल पे लिख दे तू ये गुलाल से ,
" कि रोक सकता है कोई तो रोक के दिखा मुझे ,
हक़ छीनता आया है जो अब छीन के बता मुझे "
ज्ञान के मंच पर सब एक सामान है ,
विधि का विधान पलट दे , वो ब्रहमास्त्र ज्ञान है ,
सिर्फ ज्ञान ही आपको आपका हक़ दिलाता है।
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झूट
तेरे हर झूट पे यकीन करने का मन करता है पर क्या करें तेरा हर सच बहुत कड़वा होता है
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तेरी हर आरज़ू मेरी चाहत बन जाये तेरी हर शाम मेरे नाम हो जाये जो पूरा हुआ ये खवाब तो खुदा की इनायत तेरी इबादत बन जाये
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