तकदीर बनाने वाले तूने कमी न की
अब किसको क्या मिला ये मुकदर की बात है
Wednesday, December 19, 2012
हूँ जननी तेरे जीवन की ना लूट मेरी आबरू को
देखा है तुझमे अक्स पिता , भाई , साथी और पुत्र का
ना तोड़ मेरे विश्वास को
माना था तूने दुर्गा , लक्ष्मी और सरस्वती का रूप मुझे
फिर भी करता है छलनी तू मेरे जिस्म की हर रूह को
सोचा था तेरे साये में रहूंगी महफूज़ हरदम
पर क्या पता था तू ही है मेरे जीवन की एक दुखद भूल
जननी हूँ तेरी ना लूट मेरी आबरू सरेआम
मानती हूँ रखवाला तुझे अपना ना तोड़ मेरा भरोसा सरेआम
Saturday, September 29, 2012
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी किसी से कुछ प्यारी सी बात होना
कभी किसी भूले बिसरे दोस्त से मुलाक़ात होना
कभी अनकही किसी की बातें समझ लेना
और कभी किसी के सब कुछ समझाने पे भी नाराज़ होना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी किसी अजनबी के सलीके से खुश होना
और कभी अपने ही सलीकों से नाखुश होना
कभी चिल्ला के कह देना सब कुछ
और कभी सब कुछ सुन के भी चुप रहना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी कुछ ना पा के भी खुश होना
और कभी सब कुछ पा के भी उदास होना
कभी यूँ बिना पंख के ही आसमान में उड़ना
और कभी पंख मिलने पे भी पेड़ की किसी डाल पे बैठना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी एक फूल की खुशबू से ही महक उठाना
और कभी पूरा गुलदस्ता ही सूना लगना
कभी बिना बात के घंटों किसी तस्वीर को देखना
और कभी उसकी एक नज़र भी गवारा न होना
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी दूर हो के भी किसी के पास होना
और कभी किसी के पास होने पे भी दूर लगना
एक पल लगे सब कुछ अपना सा
और एक पल लगे सब कुछ अजनबी
बस शायद और शायद यूँ ही शायद
कभी यूँ ही अच्छा लगे राहों पे चलना
और कभी हर रास्ता अनजाना लगना
कभी थाम के किसी अजनबी के हाथ उससे रास्ता पार करा देना
और कभी अपने का ही रास्ते में हाथ छोड़ देना
कभी दिल पे ना लेना किसी की बात
और कभी किसी की अनकही बात को दिल से लगा लेना
सोचता हूँ कितना बदलता है इंसान अपने ही ख्यालों में और कहता है की
बस शायद ये ना कहा होता
और शायद ये ना सोचा होता
यूँ ही शायद समझ लिया होता