Saturday, August 9, 2014

गुमाँ

कुछ तरह है लिखावट की तेरा गुमाँ हो जाता है
हमने तो तुझे भुला दिया पर
परछाइयों में तेरा गुमाँ हो जाता है
लिखे थे जो साथ अलफ़ाज़ कस्मे वादों के
उनके केवल बात होने का गुमाँ हो जाता है
यूँ तो तुझे याद नहीं करते पर
तेरी याद आने का गुमाँ हो जाता है । 

Monday, March 4, 2013

चेहरा

 कितना कुछ  बदलता है यहाँ
हर रोज़ एक नया चेहरा  मिलता है यहाँ
कहता है हर शख्स यहाँ मेरी शखशियत ही कुछ और है
मालूम हो तुम्हें तो मेरी इंसानियत ही कुछ और है
चाहता हूँ हर चेहरे पे हँसी पर वो है कुछ कीमत में दबी
उड़ने को तो तुम्हे आसमान भी नसीब है
पर बदकिस्मत है हम
हमें तो सोने को दो गज़ ज़मीन भी बदनसीब है
हमारी गरीबी पे बड़ी मासूमियत से तुम रोते हो
माँगे दो रोटी तो , काम करने की नसीहत देते हो
खुद गरीब बन के चढ़ावे चढ़ाते हो
मुरादें पूरी हुई तो हमे दान बाँटते हो
मालूम ना था एक ऐसा संसार भी होगा
जहाँ हर चेहरे पे नकाब और
हर नकाब  पे चेहरा होगा

Saturday, December 22, 2012

तकदीर बनाने वाले तूने कमी न की
 अब किसको क्या मिला ये मुकदर की बात है 

Wednesday, December 19, 2012

हूँ जननी तेरे जीवन की ना लूट मेरी आबरू को
देखा है तुझमे अक्स पिता , भाई , साथी और पुत्र  का
ना तोड़ मेरे विश्वास को
माना था तूने दुर्गा , लक्ष्मी और सरस्वती का रूप मुझे
फिर भी करता है छलनी तू मेरे जिस्म की हर रूह को
सोचा था तेरे साये में रहूंगी महफूज़ हरदम
पर क्या पता था तू ही है मेरे जीवन की एक दुखद भूल 

जननी हूँ तेरी ना लूट मेरी आबरू सरेआम
 मानती हूँ रखवाला तुझे अपना ना तोड़ मेरा भरोसा सरेआम 

Saturday, September 29, 2012

 बस शायद  और शायद  यूँ  ही शायद
कभी किसी  से कुछ प्यारी सी बात होना
कभी किसी भूले बिसरे दोस्त से मुलाक़ात होना
कभी  अनकही किसी की बातें समझ लेना
और कभी किसी के सब कुछ समझाने पे भी नाराज़ होना
 बस शायद  और शायद  यूँ  ही शायद

कभी किसी अजनबी के सलीके से खुश  होना
और कभी अपने ही सलीकों से नाखुश  होना
कभी चिल्ला के कह देना सब कुछ
और कभी सब कुछ सुन के भी चुप रहना
 बस शायद  और शायद  यूँ  ही शायद

कभी कुछ ना पा के भी खुश होना
और कभी सब कुछ पा के भी उदास होना
कभी यूँ बिना पंख के ही आसमान में उड़ना
और कभी पंख मिलने पे भी पेड़ की किसी डाल पे बैठना
 बस शायद  और शायद  यूँ  ही शायद

कभी एक फूल की खुशबू से ही महक उठाना
और कभी पूरा गुलदस्ता ही सूना लगना
कभी बिना बात के घंटों किसी तस्वीर को देखना
और कभी उसकी एक नज़र भी गवारा न होना
 बस शायद  और शायद  यूँ  ही शायद

कभी दूर हो के भी किसी के पास होना
और कभी किसी के पास होने पे भी दूर लगना
एक पल लगे सब कुछ अपना सा
और एक पल लगे सब कुछ अजनबी
  बस शायद  और शायद  यूँ  ही शायद

कभी यूँ ही अच्छा लगे राहों पे चलना
और कभी हर रास्ता अनजाना लगना
कभी थाम के किसी अजनबी के हाथ उससे रास्ता पार करा देना
और कभी अपने का ही रास्ते में हाथ छोड़ देना
कभी दिल पे ना लेना किसी की बात
और कभी किसी की अनकही बात को दिल से लगा लेना
सोचता हूँ कितना बदलता है इंसान अपने ही ख्यालों में और कहता है की
बस शायद ये ना कहा होता
और शायद ये ना सोचा होता
यूँ ही शायद समझ लिया होता  

झूट

तेरे हर झूट पे यकीन करने का मन करता है  पर क्या करें तेरा हर सच बहुत कड़वा होता है